मैं जोहारी, शौका क्यों हूँ…?

दोस्तों,

आज जो पोस्ट में लिख रहा हूँ वह थोड़ा हट कर है .. मैं कहानिया, क़िस्से, कॉमिक्स लिखता रहा हूँ पर आज कुछ अपने दिल की बात कह रहा हूँ. अक्सर अंग्रेज़ी में लिखता हूँ पर कभी कभी हिन्दी में लिखना या अपनी बोली में लिखना भी अच्छा लगता है.

कभी कभी सोचता हूँ कि मैं जोहारी क्यों हूँ? जोहारी को शौका कहते हैं तो फिर सवाल वहीं है कि मैं शौका क्यों हूँ?

पर क्या कोई पैदा होने से पहले चुनाव कर सकता है कि वह कहाँ पैदा होना चाहता है? नहीं… तो भाई मैं शौका के घर में पैदा हुआ …इसीलिए शौका हूँ.

अगर भगवान मुझे पैदा होने से पहले चुनाव करने को कहते तो क्या मैं यहीं शौका घर में पैदा होना चाहता? बड़ा पेचीदा सवाल है, है ना?

पर मैं समझता हूँ कि सबकी अपनी अपनी पसंद होगी. पर मेरी पसंद है कि मैं ऐसे घर और ऐसी जगह पैदा होना चाहता जहाँ खाने-पीने के बारे में ज़्यादा बन्धन न हो, खेलने कूदने के ख़ूब विकल्प हों, शिक्षा हो, व्यक्तिगत बातों पर ध्यान न दिया जाता हो, और जहाँ धार्मिक कट्टरता बिलकुल न हो और सबसे बड़ी बात जहाँ सुकून हो.

पर क्या शौका होना मुझे पसंद नहीं? यह मेरे लिए एक जटिल प्रश्न है. अगर पसंद नहीं है तो क्या यहीं रहना मेरी मजबूरी है. अगर मैं कहूँ कि मुझे शौका होने पर गर्व नहीं है तो मैं कहीं और क्यों नहीं चला जाता जहाँ कोई शौका न हो. 

पर मैं कैसे भुला सकता हूँ कि मेरे पुरखों ने जो कुछ किया, जो संस्कार दिया. क्या उसका कोई महत्व नहीं है? और आज हम जो कुछ कर रहे हैं क्या मैं उससे खुश नहीं हूँ?

पर अगर मैं यहाँ छोड़ कर कहीं और बस जाऊँ तो क्या मैं वहाँ आराम से रह पाऊँगा. मैं काफी सालों तक नौकरी करता रहा और नौकरी के दौरान मुझे कई शहरों में रहना पड़ा जो शौकाओं के जगहों से बहुत दूर थे. पर सच कहूँ तो मैं कहीं भी आराम या सुकून महसूस ही नहीं कर पाया, भले ही सुविधा, सहूलियत उन शहरों में अधिक थी.

भले ही मुझे अपने यहाँ की बहुत-सी बातें नापसन्द हैं, पर मैं यहाँ का निवासी हूँ और यहीं रहना और मरना चाहता हूँ. बहुतों की तरह मुझे भी विदेश जाना पसन्द है. वहाँ शायद ज़िन्दगी आसान है, साधन और खाना यहाँ से अच्छा है, और साफ़ सफ़ाई ज़्यादा है, ख़ूबसूरती, रंगीनियाँ वहाँ ज्यादे है और ज़्यादा मज़ा है. पर सच मानो तो मैं इन सब चीज़ों से बहुत जल्दी ऊब जाता हूँ, और यहाँ के भोले भाले, शौका बोली बोलने वाले, ज्या पीने वाले अपनो के बीच में रहना पंसद करता हूँ.

कभी कभी मेरा दिमाग कहता है कि दूसरे जगहों में या विदेशों में रहना ज़्यादा अच्छा है, दिमाग कहता है कि ‘फोरेन’ में बहुत मज़ा है, लेकिन दिल हमेशा यहीं कहता है, अपने लोगों में लौट चल. हर दफ़ा जब मैं कहीं और जगह से यहाँ वापस लौटता हूँ, और हिमालय की चोटियाँ देखता हूँ और किसी पहाड़ी होटल में खाना खाता हूँ, या चाय पीता हूँ, अपनी बोली सुनता हूँ तो जो संतोष मिलता है, बयाँ नहीं कर सकता. लगता है कि मैं अपनो में हूँ. थोड़ा बहुत खटर-बटर तो हर घरों में होता है पर जल्दी सामान्य भी हो जाता है. पर जो सुकून अपनो में मिलता है और कहीं नहीं मिलता है. हम सभी सुकून की ज़िन्दगी ही तो चाहते हैं…है कि नहीं?

पर कभी कभी मन में आता है कि मैं भारतीय हूँ, या शौका? पहली बात सही है, या दूसरी? मुझे सवाल पूछने का यह ढंग बेहद नापसन्द है; और अगर मुझसे मेरे शौका होने या समुदाय-परम्परा छीन ली जाए, तो मैं अपने को भारतीय भी नहीं कहना चाहूँगा. सच में… मैं भारतीय, शौका और जोहारी हूँ, और इसके बावजूद मैं उस व्यक्ति के साथ भी देशीय एकता महसूस करता हूँ, जो कहता है कि ‘मैं भारतीय, हिन्दू और पहाड़ी ब्राह्मण हूँ’ या यह कि ‘मैं भारतीय इस जाति का हूँ उस जाति का हूँ, पंजाबी हूँ , गुजराती, राजस्थानी….हूँ.’

मैं अपनी धार्मिक और बोली भाषाई विशेषता बनाए रखना चाहता हूँ, और उसी के साथ दूसरों के समान बना रहता हूँ. मेरा निश्चित विश्वास है कि हमारी विविधता राष्ट्र के रूप में हमारी शक्ति है. आप जैसे ही किसी एक राष्ट्रीय धर्म या भाषा की वकालत करके अन्य धर्मों या भाषाओं को अलग करते हैं—आप देश की एकता को नष्ट कर देते हैं, ऐसा मेरा मानना है.

हमारे देश में कई आक्रमण हुये हैं जैसे 1962 में चीन द्वारा और 1965, 1971 में पाकिस्तान द्वारा, लेकिन इन दोनों अवसरों पर अनेक भाषाओं और धर्मों के बावजूद हम एक होकर देश के लिए उठ खड़े हुए. 1962 में तो हमारी सारी अर्थव्यवस्था ही नष्ट हो गई थी पर देश की सीमा में रहते हुए हमें देश की सीमाओं की फ़िक्र थी, चेतना थी जिससे हमारा राष्ट्र मज़बूत होता है. हमने साबित कर दिया कि हम एक राष्ट्र हैं. फिर बार-बार यह चर्चा क्यों उठाई जाती है, कि देश को भारतीय बनाया जाए? और किसी को यह अधिकार किसने दिया कि वह नस्लीय भेदभाव करता रहे या हमारे रीति रिवाज, संस्कृति, बोली भाषा पर कटाक्ष करे.

तो भाई मेरी जो पहचान है मैं उसमें खुश हूँ. मेरा मानना है कि बिना पहचान (Identity) के मेरा कोई अस्तित्व नहीं है.

जितना किसी को और होने पर गर्व है, मुझे भी शौका या जोहारी होने पर गर्व है, अपनी बेली से प्यार है, अपनी संस्कृति, खान पान, रहन सहन पर अभिमान है. यहीं मेरी पहचान है.

अपनी संस्कृति, अपनी भाषा – जो मेरी पहचान है, उनको बचाना मेरा धर्म है.

(यह मेरा अपना लेख है, मेरी अपनी सोच है, पर ज़रूरी नहीं कि आप मुझसे सहमत हों. आँखिर आपका भी कोई मत होगा…).

अपना ख्याल रखें. मिलते हैं फिर एक नये पोस्ट के साथ.. जल्दी.