बोली-भाषा… कुछ मुद्दे मेरी नजर में

बोली इतनी महत्वपूर्ण है कि दुनिया भर में बोली-व्यवहार के आधार पर इलाकों की सीमाएँ तय होती हैं, प्रांतों, प्रदेशों के नाम तय होते हैं. भाषा के सवाल पर ही पाकिस्तान ने बांग्लादेश को गंवा दिया.

कहावत है कि भाषा बहता नीर है. यह दिलचस्प है कि भौगोलिक सीमांकन का आधार भी प्रकृति की यही दोनों धाराएं करती हैं, यानी भाषा और नदी. भारत में देखें तो आज़ादी के बाद रियासतों का समन्वय हुआ. उसके उपरान्त 1956 में जब राज्यों का पुनर्गठन हुआ तब देश का वह स्वरूप उभर कर सामने आया जिसमें भाषायी आधार पर राज्य बने.

मुझे तो ऐसा लगता है कि अगर हमारी बोली कुमाऊँनी बोली से भिन्न नहीं होती या कुमाऊँनी ही होती तो जो अलगाव हमें देखने को मिलता है शायद वह देखने को नहीं मिलती या कम मिलती. शायद भोटिया शब्द इतना racial नहीं होता. ज़ाहिर है भाषा बोली के आधार पर दारमा, व्यास, चौदास घाटी वालों को भी जाना जाता होगा.

अब देखिये हिन्दी और हिन्दुस्तानी में भी भेद रहा है. हिंदुस्तानी मूलतः अंग्रेज़ों का दिया हुआ शब्द है. वे जानते थे कि यह उत्तर भारत के अधिकतर भागों में बोली और समझी जानेवाली भाषा है, इसीलिए उन्होंने इसे हिंदुस्तानी याने हिंदुस्तान की भाषा कहा. फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में 19वीं सदी के आरंभ में हिंदी की पाठ्य-पुस्तकें हिंदुस्तानी के नाम से ही बनीं. उसी समय हिंदवी के नाम से अरबी-फ़ारसी लिपि में लिखी उर्दू की पाठ्य-पुस्तकों का भी लेखन शुरू हुआ. इस तरह औपचारिक स्तर पर दो भाषाओं का विभेद हुआ, हालाँकि बहुत समय तक सामान्य बोलचाल की भाषा को हिंदुस्तानी कहा जाता रहा. संभवतः आज भी लोग कुछ आम बोलचाल की भाषा को हिंदुस्तानी मानते हैं. वे कहते हैं, मैं हिंदुस्तानी बोलता हूँ.

इस शब्द का दूसरा संदर्भ गांधी जी से जुड़ता है. गांधी जी के नेतृत्व में जो भाषा नीति अपनाई गई वह कांग्रेस की हिन्दू मुस्लिम एकता लाने की पद्धति से मेल खाती थी. गांधी जी ने कहा था कि कांग्रेस हिन्दुस्तानी का समर्थन करती है. हिन्दुस्तानी न तो हिन्दी होगी न ही उर्दू, बल्कि दोनों का मिश्रण होगी. उसे देवनागरी और फ़ारसी दोनों लिपियों में लिखा जा सकेगा. इसका काफी विरोध हुआ जिसमें प्रमुख थे- पुरुषोत्तम दास टंडन, रविशंकर शुक्ल, घनश्यामदास गुप्त, आदि. हिन्दी और हिन्दुस्तानी के विवाद में गांधी जी ने 1945 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन से त्यागपत्र दे दिया.

देश विभाजन के बाद जनसाधारण ने अनुभव किया कि हिन्दुस्तानी एक मृगतृष्णा है जो हिन्दू और मुसलमानों के बीच एकता उत्पन्न करने का साधन नहीं हो सकती.

16 जुलाई 1947 को कांग्रेसी संसदीय दल ने इस बात पर विचार किया कि राजभाषा किसे बनाया जाय – हिन्दी को या हिन्दुस्तानी को. किन्तु जब मतदान हुआ तो हिन्दी के पक्ष में 63 और हिन्दुस्तानी के पक्ष में 32 मत पड़े. देवनागरी लिपि के पक्ष में 63 और विपक्ष में 18 मत थे. हिन्दुस्तानी के समर्थकों में जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आज़ाद, सरदार पटेल जैसे लोग थे.

मतदान के फलस्वरूप संविधान के प्रारूप में तुरंत प्रतिबिंबित हुआ. फ़रवरी 1948 में जब संविधान का प्रारूप परिचालित किया गया तो उसमें हिन्दी शब्द था, हिन्दुस्तानी शब्द हटा दिया गया. राजभाषा से सम्बन्धित सभी बातों में कोई विवाद नहीं हुआ. संविधान के राजभाषा भाग में चार अध्याय है – (1). संघ की भाषा (2) प्रादेशिक भाषायें (3) उच्चतम और उच्च न्यायालय की भाषा, और (4) विशेष निदेश.

यह घोषित हुआ कि संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी. किन्तु अंक देवनागरी लिपि में नहीं होंगे. अंकों का जिस रूप का शासकीय प्रयोजनों के लिए किया जायेगा उसे भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप कहा गया है.

चलो अब बात करता हूँ हमारी बोली के सम्बन्ध में. अगर अनुभव के आधार पर कहूँ तो मुझे लगता है कि हमारी बोली काफी हद तक कुमाऊँनी से मिलती है. पर कुमाऊँनी भी बोली ही है. इसमें भी समरूपता नहीं हैं.. जैसे काली कुमाऊँ की बोली, दानपुर की बोली, शाह लोगों की बोली, कत्यूर घाटी की बोली, आदि. 

हमारी बोली में भी ऐसा ही कुछ मुझे दिखता है. पंच ज्वारियो की बोली में मुझे तिब्बती का प्रभाव दिखता है. ऐसे ही हम लोग जो दानपुर की तरफ बस गये हैं जैसे फरसाली, गुलेर, कपकोट, शामा.. वहां की बोली में थोड़ा दानपुरी बोली का प्रभाव दिखता है. आदि… 

ये तो एक बात हुई.. प्रभाव की. 

पर जो बात में कहना चाहता हूँ हमारी बोली जैसा भी प्रचलित है, जैसा भी सम्बाद शैली, उच्चारण है… वह जिस रूप में सामान्य लोक में प्रचलित है वहीं समझ में आती है. 

पर सबसे बड़ी बात है कि न तो कुमाऊँनी बोली में न ही हमारी बोली में कोई व्याकरण रचना हुई है. अन्य बोलियों की तरह हमारी शब्दावली का जो भंडार है उसके उच्चारण की जो एक विशिष्ट तकनीक, पुट या शैली है  उसमें अधिकांश शब्दों में अक्षर चाहे व्यंजन मात्र हो या स्वर की मात्रा युक्त व्यंजन हो उनके अक्षर विशेषों का उच्चारण, यदि ह्रस्व छोटा है तो उसे देवनागरी लिपि में भली भांति हमारे आने वाले शब्द कोष में दर्शाना होगा. हमारी बोली में शब्द विशेषों का ह्रस्व उच्चारण संबन्धी संकेत के निर्धारण करने में अलग अलग मत हमारे सामने आये हैं. 

हमारे सामने जो चुनौती है कि किस प्रकार कहां कौन सा चिन्ह लगाया जाय जिससे सामान्य जन या सीखने वालों को ह्रस्व उच्चारण का संकेत भी स्पष्ट रूप से दिखे और समझ में आ जाये. 

हिन्दी भाषा के व्याकरण नियमों के कारण हमारी बोली में इस प्रकार के सटीक संकेत को दर्शाने वाले संकेत का निर्धारण कठिन होगा, क्योंकि हमें तो देवनागरी लिपि में ही लिखना है. हिन्दी की तरह हमारे पास कोई व्याकरण है नहीं, तो जैसा भी व्याकरण हमारी बोली में प्रचलित है, उसी को आधार बनाकर एवं परिष्कृत कर हमें अपना व्याकरण बनाना होगा. 

मेरा मानना है कि हमारी बोली-भाषा के लिए आवश्यकता के अनुरूप व्याकरण को रचा या गढा जा सकता है. पर मेरा यह भी मानना है कि इस प्रकार का कार्य यदि भाषा विशेषज्ञ या जो हमारी बोली में पारंगत है करेंगे तो हम एक समृद्ध एवं निर्दोष व्याकरण को रच सकते हैं. 

अभी तक जो शब्द लोगों ने लिखने में प्रयोग किए हैं उसमें सब की अपनी-अपनी शैली दिखती है. ह्रस्व उच्चारण वाले शब्दों को कुछ लोग अक्षर के नीचे हल् या हलत्ं चिन्ह (् ) लगा कर दर्शाते हैं. जिससे हलत्ं वाले अक्षर का उच्चारण सामान्य से छोटा होता है. पर कहीं कहीं तो मुझे अनायास लगते हैं क्योंकि कुछ लोग बहुत अक्षरों के नीचे हलत्ं लगाते हैं चाहे उसके उच्चारण में वे आवश्यक हो या न हो. 

जैसे जा्न… मतलब जाना. यहां जा् में हलतं लगने से जा् का उच्चारण सामान्य जा का आधा उच्चारण होगा. पर कुछ लोह हलतं नहीं लगाते हैं वे न मे हलतं लगाते  हैं या दोनों में लगाते है…. ये सब हमें तय करना पड़ेगा.

जहां अक्षरों के बीच विस्तार देना हो तो कुछ लोग अंग्रेजी के s या बड़ा S लगाते हैं. पर इसमें भी सभी की अपनी शैली है. जैसे रात… कुछ लोग राsत लिखते हैं… यह भी एक मसला है, इसमें सहमति बननी है.

जहां तक व्याकरण का सवाल है हमें सबसे ज्यादा मेहनत क्रिया (verb) पर करनी पड़ेगी. क्योंकि संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण के जो हमारे शब्द हैं वे लगभग वैसे ही रहते हैं उनका रूप नहीं के बराबर बदलता है पर क्रिया का रूप समय-काल के हिसाब से बदलता है… भूत काल, वर्तमान काल, भविष्य काल. तो हमारी क्रिया का रूप भी काल के हिसाब से ही बदलना होगा और उनको सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करना होगा जिसके कि सीखने वालों के समझ में आये और वे उसी तरह बोलें… 

उदाहरणार्थ – 

I go – मै जानु (वर्तमान काल) 

I went – मै गे (भूतकाल) 

I shall go – मै जौंल (भविष्य काल) 

अगर हमारी क्रिया मजबूत होगी तो हमारा व्याकरण मजबूत होगा. या यूं कहें कि कि क्रिया व्याकरण का राजा है बाकी उसकी प्रजा है, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.

अभी बस इतना ही… वैसे ही लेख लम्बा हो गया है.