श्रद्धाजंलि : भवान सिंह धर्मशक्तू ‘भागवतानन्द सरस्वती’, जिनकी पुण्य तिथि जुलाई महिने में थी.

देश की आजादी को हासिल करने में अनगिनत लोगों का योगदान रहा है. इन स्वतंत्रता सेनानियों में कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने कभी अपने परिवार की परवाह नहीं की. कठिनाई से जूझते हुए वे जीवन डगर में देश सेवा में आगे बढ़ते रहे.

राष्ट्र की स्वाधीनता के कारण अपने परिवार का सर्वनाश देखने के पश्चात भी जिस व्यक्ति के जीवन में देश सेवा में समर्पित होने के अतिरिक्त कुछ शेष नहीं रह गया था, वह भवान सिंह धर्मशक्तू ही थे.

उन्होंने लाल सिंह धर्मशक्तू के घर में 15 मार्च 1891 को जन्म लिया. भवान सिंह जी बचपन से ही धार्मिक एवं सात्विक प्रवृति के व्यक्ति थे. परिवार का तिब्बत के साथ व्यापार होने के कारण उन्हें तिब्बती भाषा का अच्छा ज्ञान था. परंतु अल्प शिक्षा और अभावग्रस्त गृहस्थी के मध्य जोहार के तृतीय श्रेणी के व्यवसाय द्वारा संघर्षमय जीवन के प्रारंभिक काल में ही इनमें त्याग और आत्म शुद्धि की भावना पनपने लगी. अत: अपने पैतृक व्यवसाय को छोड़कर इन्होंने सन् 1919 से सात बर्षो तक टिहरी में और पाँच बर्षो तक मिलम में तिब्बती भाषा के शिक्षक के रूप में कार्य किया. तत्पश्चात सन् 1936 से 1940 तक गाँधी आश्रम, चनौदा के खादी उत्पादन केन्द्र में ऊनी बस्त्र उत्पादन का कार्य किया.

द्वितीय विश्वयुद्ध के आरंभ हो जाने पर भारत को भी इस युद्ध में शामिल किये जाने के आदेश से रुष्ठ होकर कांग्रेस मंत्रिमंडल प्रन्तीय सरकारों से त्याग पत्र देने लगा था और युद्ध विरोधी सत्याग्रह की घोषणा आरंभ हो गई थीं. बिनोबा, नेहरू और पंत आदि राष्ट्रीय नेताओं की भाँति अलमोड़ा जिले के हरगोबिदं पंत, बद्रीदत्त पांडे और दुर्गासिहं रावत आदि ने भी 1941 के बागेश्वर मेले में सत्याग्रह आन्दोलन का मंत्र फूँक दिया था. जिससे अंग्रेजों के विरुद्ध कुमाऊँ में भी जनाक्रोश प्रज्वलित होने लग था.

ऐसे अवसर पर भवान सिंह भी स्वयं को इस आन्दोलन में आहूत करने से नहीं रोक सके और गांधी आश्रम से त्याग पत्र देकर “इस खूनी लड़ाई में धन जन से सहायता देना हराम है” का नारा लगाते हुए गोरी फाट में युद्ध विरोधी भावनाओं का प्रचार करते समय 18 फरवरी 1941 को मदकोट में गिरफ्तार कर लिए गए.

कुछ दिन पिथौरागढ मे रखने के उपरांत एक वर्ष की कैद तथा 125 रु. का आर्थिक दडं देकर इन्हें अलमोड़ा कारागार भेज दिया गया. कारागार में नित्य संध्या वंदन करते हुए जीवन बिता ही रहे थे कि अकस्मात् उनके जीवन में एक बज्रघात पड़ गया. पत्र द्वारा उनको ज्ञात हुआ कि दो बच्चों सहित उनकी सहधर्मिणी और पूज्यनीय माता जी का हैजे के प्रकोप से निधन हो गया. घर में अब केवल 13 बर्ष का एक लड़का ही बच पाया था. इस आघात को सहते हुए उन्होंने सोचा कि जन्म देने वाली माता की सेवा तो न कर सका, अब जन्मभूमि की माँ की सेवा में समर्पित होना ही श्रेयस्कर होगा.

अलमोड़ा के पश्चात् 19 अगस्त 1941 से बरेली कारावास की यातना सहने के बाद 13 दिसम्बर 1941 को इन्हें मुक्त कर दिया गया. परन्तु जिस व्यक्ति ने अपने गृहस्थ जीवन का सर्वनाश देख लिया हो, उसके जीवन में बचा ही क्या था, सिवाय देश सेवा के.

जेल से छूटने के बाद वे भारत छोड़ो आंदोलन में पूर्ण रूप से समर्पित हो गए. आंदोलन के लिए वे पदयात्रा पर निकल पड़े. अपने क्षेत्र के कई अन्य सत्याग्रहियों के साथ हाथ में तिरंगा लेकर जब ये मेले, कौतिको और गाँव गाँव में अंग्रेजों के विरुद्ध जनाक्रोश उत्पन्न करते हुए भ्रमण कर रहे थे, 28 सितम्बर 1942 की रात्रि में सेला ग्राम में एक गोरे अधिकारी द्वारा पुनः पकड़ लिए गए. 5 अक्टूबर 1942 को थल पड़ाव में डेढ़ वर्ष की सजा सुनाकर इन्हें भी जोहार के अन्य सोलह साथियों के साथ अल्मोड़ा और बरेली जेलों को भेज दिया गया. वहाँ कैदियों के द्वारा जेल अधीक्षक को दिये जाने वाले अपमानजनक परेड का विरोध करने पर सल्ट के गंगा दत्त शास्त्री और अन्य पाँच साथियों सहित इनको भी 15 दिन के लिए खूनी अभियुक्तों की भाँति बेडियाँ पहनाई गई और दोनों पाँवों तथा कमर में लोहे की कडियाँ (मतभंगा) डाल दी गई. 

16 अगस्त 1943 से लखनऊ कैम्प जेल में रहने के बाद, 6 जनवरी 1944 को इनको कारावास जीवन से मुक्ति मिल गई. स्वाधीनता संग्राम में भाग लेते हुए सत्याग्रह शिविरों और कारावास यात्राओं से मुक्त हो जाने के पश्चात सन् 1946 में इन्होंने सन्यास ग्रहण कर लिया. तब से ये ‘भागवतानन्द सरस्वती’ के नाम से जाने जाते थे. सन्यास ग्रहण करने के पश्चात् अब ये पर्वतीय और मैदानी भागों के ग्रामीण अंचलों में अवैतनिक रूप से प्रौढ़ शिक्षा कार्य करते रहे, फिर दो वर्ष तक कपकोट और तीन वर्ष तक चौबटिया के उद्यान विभाग में भी अवैतनिक सलाहकार रहे. इस प्रकार सार्वदेशिक भावनाओं से ओतप्रोत होने के कारण इनका कार्य क्षेत्र विस्तृत हो गया था. वे जीवन के अन्तिम क्षण तक वे मानव मात्र की सेवा करते रहे.

सन् 1958 में उत्तर प्रदेश के मंत्री चौधरी चरण सिंह से लड-झगड कर ये जोहार के 27 भूमिहीन परिवारो को तराई भावर के गुलरभोज में 5 एकड़ प्रति परिवार को भूमि दिलाने में भी सफल हुए. इसी वर्ष से इन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में 30 रु़ प्रति माह की आर्थिक सहायता मिलने लगी. 

जीवन के प्रारंभिक काल में अभावग्रस्त रहकर, तरुणास्वथा में कठोर परिश्रम करके, युवावस्था में राष्ट्रीय आंदोलन में तरह तरह की यातनायें सहते तथा वृद्धावस्था में अल्पाहार एवं समाज सेवा के लिए स्वयं को समर्पित करने वाला भारत माँ का यह सपूत मात्र चार दिन अस्वस्थ रहने के पश्चात् जुलाई 1969 को भारत माता की गोदी में समा गये.

जोहार और देश के इस महान विभूति को शत् शत् नमन!